उत्तर रेलवे कर्मचारी यूनियन

संगठन व इसका इतिहास

उत्तर रेलवे कर्मचारी यूनियन ही क्यों?

  इस विषय में एक बात विचारणीय है इस विषय में एक बात विचारणीय है  की रेलों पर सरकारी मान्यता प्राप्त दो फेडरेशन ओं में से एक फेडरेशन तो केवल कागजों के ऊपर चलता है जो अब तक सरकारी मान्यता का उपयोग ना तो रेल कर्मचारियों के हित में कर सका और ना ही रेल कर्मचारियों के नेतृत्व और संगठन का उपयोग राष्ट्र और समाज के हित में कर पाया | दूसरा रेल सरकार द्वारा मान्य फेडरेशन राष्ट्र द्रोही कम्युनिस्ट बहुल फेडरेशन है| जिसके कमजोर और उदारवादी नेतृत्व की आड़ में  देशद्रोही लाल ताकतें भोले भाले देशभक्त रेल कर्मचारियों के बीच में अपना खूनी पंजा जमाती रही है | खेद का विषय है कि जिस फेडरेशन को सन 1949 में हमारे प्रातः स्मरणीय प्रखर राष्ट्रवादी नेता तत्कालीन गृहमंत्री लोह पुरुष सरदार पटेलऔर फेडरेशन के महान त्यागी परम लोकतंत्र वादी तत्कालीन अध्यक्षमाननीय जयप्रकाश नारायण जी ने अपनी बुद्धि चातुर्यदूरदर्शी सफल संगठन नीति से जिन राष्ट्रद्रोही खौफनाक अराजक लाल तत्वों से पूर्णतया मुक्त करा दिया था, वही फेडरेशन कालांतर मैं पुनः लाल गद्दारो और घुसपैठिओं का अड्डा बन गया है । जिसका भंड़ा-फोड़ सन १९६२ मैं चीनी हमले के वक़्त हुआ । इस काल अविधि की सबसे शर्मनाक घटना घाटी थी वह यह कि दक्षिण पूर्व पर जिसका नेतृत्व कम्युनिस्ट नेता रॉयल व विश्वास कर रहे थे। १९६२ मैं चीन आक्रमणकारी को मुक्ति फ़ौज कि संज्ञा दी गयी ।

AIFR कि यूनियन साउथ ईस्टर्न रेलवे मेंस यूनियन के कार्यालय मैं भारत विरोधी साहित्य बरामद हुआ, है का महामंत्री गिरफ्तार हुआ । रेल कर्मचारियों के माथे पर देशद्रोही का कलंक लगा । राष्ट्रवादिओं के मन मैं चिंता होना स्वाभाविक था और शुरू हुई रेलवे मैं राष्ट्रवादी श्रमिक संगठन बनाने कि प्रक्रिया । सर्वप्रथम १९६२ मैं पूर्वोत्तर रेलवे श्रमिक संघ कि स्थापना हुई । धीरे -धीरे सभी जोनों मैं यूनियन बनाने लगी । तत्कालीन गृहमंत्री परमपूज्य प्रातः स्मरणीय माननीय लालबहादुर शास्त्री ने उस फेडरेशन के महामंत्री को पत्र लिखकर उस गद्दार यूनियन के प्रति उचित कार्यवाही करने का आग्रह किया था । किन्तु फेडरेशन का पद-लोलुप और कमजोर नेतृत्व दक्षिण-पूर्व रेलवे पर अपनी नेतागिरी को सुरक्षित रखने के लिए देशद्रोहियों के सामने झुक गया और उनकी सभी राष्ट्रद्रोही हरकतों पर पर्दा डालने कि ही कोशिश कि गयी ।
उस समय तो उस फेडरेशन से सम्बंधित केवन एक साउथ ईस्टर्न रेलवे मेंस यूनियन ही लाल परिधान वाली थी, किन्तु आज तो इसकी लगभग सभी यूनियन कमोबेश हलके गुलाबी रंग से गहरे लाल रंग मैं डूबती जा रही हैं और ये नकाबपोशों कि तरह केवल दिखाने मात्र के लिए ही चोटी का नेतृत्व उदारवादियों के हाथ में दे रखा हैं जो वक़्त -जरूरत पर किसी भी तरफ झुकाये जा सकते हैं । अब सरकार में बैठे हुए देश के कर्णधार नेताओं को भी यह समय रहते ही सोचना है कि क्या इस नाजुक स्तिथि में भी देश कि रक्षा के लिए रेलवे जैसे महत्व के उद्योग में एक ओर तो केवल पार्टीबाजी के लिए निर्जीव, बोगस कागज़ी फेडरेशन और दूसरी ओर राष्ट्रघाती कम्युनिस्ट बहुत फेडरेशन कि सरकारी मान्यता को कायम रखकर तथा उस मान्यता कि आड़ में देशद्रोही तत्वों को मजदूर छेत्र में घुसपैठ करने और खुलकर खेलने कि छूट देकर बाह्य आक्रमण तथा भीतरी असंतोष और नैराश्य से घिरे हुए देश का सर्वोपरि हित सुरक्षित रखा जा सकता है ? या इन खतरनाक प्रवृतिओं से लोहा लेने के लिए और समय आने पर औद्योगिक शांति को बनाये रखकर पूरे मजदूर समाज को राष्ट्र कि सुरक्षा और आर्थिक विकास के लिए हर तरह कि कीमत चुकाने और कुर्बानी देने के हेतु उन्हें संगठित और प्रेरित करने के लिए राष्ट्र-प्रेमी देशभक्त, दल-निरपेक्ष रेल मज़दूरों के स्वयं-स्फूर्ति से निर्मित, गैर राजनैतिक, आज़ाद संगठन को रेल कर्मचारियों के बीच में काम करने का अवसर देकर रेल के मज़दूरों का, समाज का और देश का, सर्वोपरि हित एक साथ साधा जाए ।

भारतीय रेलवे मज़दूर संघ सरकारी मान्यता को केवल अपनी ही सुविधा और लाभ के लिए या केवल रेल कर्मचारियों के ही हित और कल्याण के लिए नहीं बल्कि देश के सर्वोपरि हित के लिए भी मर्यादित ढंग और वैधानिक मार्ग से प्राप्त करने का प्रयास करेगा । जब शहीद रेल कर्मचारी कि पत्नी ने उद्घाटन किया मुंबई महानगरी के मुलुडड क्षेत्र में रामायण ज्ञान मंदिर का प्रांगण युवा रेल कर्मचारिओं कि उमंगो से झूम रहा था ।

रैलकामगार नया इतिहास रच रहे थे । यह भारतीय रेलवे मजदूर संघ का स्थापना अधिवेशन था । राष्ट्रभक्ति से ओतप्रोत नारे और गीत गूंज रहे थे । भग्वे झंडों और बैनरों से पंडाल सजा था मंच पर माननीय ठेंगड़ीजी, दादा मुकर्जी और बड़े भाई सहित अन्य प्रेरक पुरुष पहुँच चुके थे । ध्वनि विस्तारक यन्त्र से सूचना दी जा रही थी कि थोड़ी देर में ही अधिवेशन का उद्घाटन होने जा रहा है । सभी प्रतिनिधि सोच में थे के माननीय ठेंगड़ीजी आ चुके हैं, फिर प्रतीक्षा किसकी की जा रही है ? कुचने अनुमान लगाया, शायद कोई बड़ा राजनेता उद्घाटन के लिए आने को होगा किन्तु सर झुकाये थोड़ी देर में एक पतली- दुबली महिला गॉड में छह-सात माह कि बच्ची के साथ आयी और आयोजकों ने उसे ससम्मान मंच पर बिठाया । खचाखच भरे पंडाल में प्रतिनिधिगण चर्चने लगे के यह सामान्य सी दिखाने वाली युवती कौन है ? इतने में मंच से घोसणा हुई कि भारत-पाक युद्ध के दौरान प्राणोत्सर्ग करने वाले फायरमैन चमनलाल कि पत्नी श्रीमती आशारानी इस नवोदित संगठन भारतीय रेलवे मजदूर संघ के प्रथम अधिवेशन का उद्घाटन करेंगी । मण्डप का वातावरण शांत हो गया और १९६५ के भारत – पाक युद्ध के दौरान फ़िरोज़पुर के मोर्चे पर अपना कर्त्तव्य पालन करते हुए शहीद हुए युवा रेल कर्मचारी चमनलाल कि स्मृति में जनसमूह कि आँखे भर उठी और शर्माती आशारानी ने डीप जलाकर अधिवेशन का उद्घाटन किया । माइक के सामने वह इतना कह सकी कि यह नया संगठन जरूर कामयाब होगा । तालियों कि गड़गड़ाहट के साथ ऐसे किआ एक शहीद कि विधवा ने भारतीय रेलवे मजदूर संघ के प्रथम अधिवेशन का उद्घाटन ।

रेलवे पर बोनस का इतिहास
भारतीय रेलवे मजदूर संघ के निर्माण से पहले अर्थात १९६५ के पूर्व रेल कर्मचारियों को बोनस कि कोई कल्पना नहीं थी । जुलाई १९६० कि ऐतिहासिक रेल हड़ताल के मांग पात्र में बोनस कि मांग का न होना इसका प्रत्यक्छ प्रमाण है । यद्यपि आल इंडिया रेलवे मेंस फेडरेशन रेलों के ऊपर १९२५ से ही कार्यरत था और अन्य उद्योग धंधों में बोनस कि अदायगी दुसरे विश्व – युद्ध के दौरान अर्थात १९४२-४३ से ही प्रारम्भ हो चुकी थी । दिसंबर १९६५ में भारतीय रेलवे मज़दूर संघ ने अपने स्थापना अधिवेशन में जब रेल कर्मचारियों कि अन्य मौलिक मांगों के साथ बोनस कि मांग को प्रमुख रूप से उठाया और प्रस्ताव पारित किआ तो रेल शासन और प्रशासन के साथ – साथ आल इंडिया रेलवे मेंस फेडरेशन के नेताओं ने भी इस मांग कि पूर्ती को असंभव बताया और उपहास करते हुए कहा कि जिस प्रकार नया मुल्ला ज्यादा प्याज खता है, उसी प्रकार यह नया संगठन अनोखी और अनहोनी मांग उठा रहा है  किन्तु भारतीय रेलवे मज़दूर संघ अपनी इस मांग पर डटा रहा और समय-समय पर आंदोलन करता रहा । साथ ही अब तक जो लोग बोनस
को मुनाफे का एक भाग मानते रहे उनको समझाता रहा कि उद्योग धंधा चाहे निजी हो या सरकारी उन में काम करने वाले कर्मचारी जब तक जीवन वेतन नहीं पाते । जो अभी तक नहीं पा रहे हैं । तब तक बोनस विलम्बित वेतन के रूप में मिलना उनका हक़ होता है । और वर्ष के अंत में कम से कम एक माह का वेतन उन्हें बोनस के रूप में मिलना ही चाहिए